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बुधवार, 23 मार्च 2011

कविता

 
वह एक अट्ठाइस-तीस के दरमियानी नौजवान था।
वह मुझे रोजाना मिलता बाग में फूलों को देखकर मुस्कुराता हुआ।
मैं जब पहुँचता वहाँ तो वह बस मुस्कुरा रहा होता
मैं जब लौटता वहाँ से तो भी वह बस मुस्कुरा रहा होता।
एक दिन बगीचे के चौकीदार ने बताया
'वह आँखों से नहीं देख सकता'
मैंने देखा, वह उस समय भी देख रहा था फूलों को।
मुझे करीब पाकर वह बोला,
'मुस्कुराने के लिए भला आँखों का भी कोई काम है'
उसकी बात सुनकर मैं जोर से हँस पड़ा था
इतनी जोर से कि मेरी हँसी की आवाज सुनकर
उसने अपनी मुस्कुराहट को और चौड़ा कर लिया था
और फिर मेरे साथ
वह भी जोर - जोर से हँसने लग पड़ा था
इतनी जोर से कि
बगीचे का बूटा-बूटा मुस्कुरा पड़ा था।

बगीचे जाने के नाम से ही अब मेरे लबों पर कौंध पड़ती मुस्कुराहट
वहाँ वह दिखाई देता तो मुस्कुराहट हँसी में बदलती
और फिर रोज-रोज हमारे साथ मुस्कुराती यह दुनिया।

एक दिन मैंने उसे बताया कि मैं लिखता हूँ कविता
तो वह उदास हो गया
वह उदास हो गया तो मैं उदास हो गया
मैं उदास हो गया तो मेरी कविता उदास हो गई
फिर हमारी उदासी से उदास हो गई यह दुनिया
और एक दिन उदास-उदास स्वर में
अत्यंत वेदना के साथ उसने पूछा मुझसे
'कविता में भला लिखने का क्या काम'
उसका सवाल सुन मैं हँस पड़ा जोर से
इतने जोर से कि मुस्कुरा उठा वह
और उसको मुस्कुराते देख मेरी हँसी की तान और बढ़ गई
और मुझे हँसते देख जोर-जोर से वह भी खिलखिलाकर हँस पड़ा
इतनी जोर से कि खिलखिला उठी दुनिया।

उस दिन शाम को मैं अपनी लिखी कविताओं को झोंक आया हूँ
फुटपाथ पर झोपड़ा बनाए उस भिखारी के चूल्हे में
चूल्हें में बनावट की ईंधन ने कमाल किया
और चूल्हे से चट-चट की आवाज के साथ जोर से जलने लगे मेरी कविताओं से रंगे पन्ने
इतने जोर से कि उस भिखारी के चारों बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े
और अपनी मुट्ठी में चूल्हे की तेज लौ पकड़ने का खेला खेलने लगे

उस दिन नींद के पहले बच्चों को मिल गया था खाना।

                                                                                   - पुष्पेन्द्र फाल्गुन

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

आखिर नेट पर आ ही गया फाल्गुन विश्व का जनवरी अंक!

जैसा कि वैचारिक और साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन के साथ होता है, जनवरी का अंक फरवरी में आ रहा है, वह भी नेट पर, छप कर आने में अभी दो-तीन दिन का विलम्ब है. बहरहाल आपके लिए यहाँ लिंक है, सो आप तो यहीं पढ़ लीजिये.


बुधवार, 8 दिसंबर 2010

आजीवन विद्रोही रहे वामन निम्बालकर

आजीवन विद्रोही रहे वामन निम्बालकर
बालपन में निर्धनता, तिरस्कार, अपमान और अवमानना से रूबरू होकर जो अनुभव वामन निंबालकर ने भोगा था, ताजिंदगी उस अनुभव से समग्र मानव समाज को बचाने की कवायद करते रहे। कभी कविता लिखते, कभी अखबार निकालते, कभी आंदोलनों से जुड़ते, कभी खुद आंदोलन बन जाते, कभी साहित्य सम्मेलन आयोजित करते, कभी अध्यापन करते, कभी प्रचार करते, तो कभी भाषण देते। यह विद्रोह की वामन निंबालकरी शैली थी, जिसकी मशाल उन्होंने आजीवन जलाए रखी। जीवन का हर क्षण, हर शै, उन्होंने समाज को अर्पित किया। सतत कार्यरत रहना और डॉ. बाबासाहब भीमराव आंबेडकर के समता-सूत्र को समाज में स्थापित करना ही वामन निंबालकर का ध्येय था। इस ध्येयपूर्ति के लिए उन्होंने हर वह तरीका अपनाया, जिससे समाज के दलित, शोषित, वंचित और पिछड़े तबके से सदैव उनका संवाद बना रहे।
13 मार्च 1943 को बुलढाणा के लांजुल गांव में एक अति निर्धन परिवार में पैदा हुए वामनराव के सिर से माता-पिता का साया बालपन से ही उठ गया था। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के 'शिक्षित बनो-संगठित रहो' की सीख को आत्मसात करनेवाली पहली पीढ़ी के दलित विद्रोहियों में से एक, वामनराव की महाविद्यालयीन शिक्षा औरंगाबाद में हुई। विद्यार्थी जीवन से ही उन्होंने आंदोलनों को अपने आक्रोश और विद्रोह की अभिव्यक्ति का जरिया बनाया और अभिव्यक्ति को शब्द बद्ध करने के लिए कविता का सहारा लिया। 1973 में उनका पहला काव्य संग्रह 'गावकुसाबाहेरील कविता' प्रकाशित हुआ। अपने पहले ही संग्रह से वामन निंबालकर प्रमुख दलित साहित्यकार के तौर पर प्रतिष्ठित हो गए। इस काव्य संग्रह के तीन संस्करण प्रकाशित हुए। पहली पीढ़ी के मराठी दलित लेखकों बाबूराव बागुल, केशव मेश्राम, दया पवार और नामदेव ढसाल के साथ वामन निंबालकर का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। साहित्यिक लेखन के साथ वामन निंबालकर के वैचारिक लेखन की प्रगल्भता से समस्त मराठी संसार परिचित है। उनकी कई कविताएं महाराष्ट्र के अनेक विश्वविद्यालयों के पाठयक्रमों का हिस्सा हैं। उनकी अनेक कविताओं का जर्मन, रूसी एवं अंग्रेजी भाषा में अनुवाद हुआ है। अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में 'वैश्विक साहित्य' के पाठयक्रम में वामन निंबालकर की कविताएं भी विश्व साहित्य के विद्यार्थियों को पत्रढाई जाती हैं। वामन निंबालकर की 'माय' कविता मराठी की दस विशिष्ट कविताओं में शामिल है।
साहित्य की विशिष्ट भाषा-शैली को नकारकर वामन निंबालकर ने आम आदमी की भाषा में साहित्य सृजन किया। उनके प्रकाशित तीनों काव्य संग्रहों, 'गावकुसाबाहेरील कविता', 'महायुद्ध' और 'बाहत्या जखमांचा प्रदेश' अथवा शीघ्र प्रकाश्य कहानी संग्रह 'आग' की भाषा शैली अत्यंत आम-फहम है। इसी वजह से उनका साहित्य आमजन में लोकप्रिय हो सका और समालोचकों का भी ध्यान आकृष्ट कर सका। लेकिन वामन निंबालकर जानते थे कि महज कविता लिखकर ही दलित समाज के उद्धार का बाबा साहब का सपना पूरा नहीं किया जा सकता। सो, उन्होंने दलितों में आत्म सम्मान जगाने और दीन-दुनिया के हाल और विचार उन तक पहुँचाने के लिए अनेक साप्ताहिक, मासिक और त्रैमासिक पत्रों एवं पत्रिकाओं का प्रकाशन-संपादन किया। वामन निंबालकर प्रकाशित एवं संपादित साप्ताहिकों में भीमसंदेश (1965 से 1972), प्रबोधन (1972), लोकायत (1978) और आज चे प्रबोधन (1995 से अब तक) का नाम उल्लेखनीय है। वामन निंबालकर दलित आंदोलन की हस्ताक्षर पत्रिका 'अस्मितादर्श' के 1967 से 1976 तक संपादक रहे। कुछ समय तक उन्होंने 'समुचित' नामक त्रैमासिक का भी संपादन किया। उन्होंने 1979 से मासिक पत्रिका 'परिचारिका' शुरु की, जो आज भी प्रकाशित हो रही है। औरंगाबाद में रहते हुए ही वामन निंबालकर ने 'प्रबोधन' प्रकाशन की स्थापना की और नागपुर आकर इस प्रकाशन संस्था के जरिए कई नवोदित मराठी साहित्यकारों से पाठकों को परिचित कराया। उनके कविता संग्रह 'महायुद्ध' 1988-89 में महाराष्ट्र सरकार ने उत्कृष्ट साहित्यिक रचना के रूप में पुरस्कृत किया। उनके अंतिम कविता संग्रह 'बाहत्या जखमांचा प्रदेश' को इस वर्ष पुनः राज्य सरकार ने उत्कृष्ट साहित्यिक रचना के तौर पर पुरस्कृत किया है। मृत्यु से एक दिन पहले ही इस संबंध में राज्य सरकार की ओर से उन्हें सूचित किया था।
वामन निंबालकर एक ओर अपनी साहित्य संपदा एवं वैचारिक लेखन के जरिए आम मराठी पाठक में प्रतिष्ठित रहे, वहीं उनकी प्रतिष्ठा कई लोगों के निशाने पर भी थी। आजीवन शरद पवार जैसे नेता से अपनी नजदीकी के चलते अपने सहजीवियों के तंज का दंश उन्होंने झेला था। औरंगाबाद में एक महिला से मित्रता के लिए भी उन्हें कई बार लांछित करने का प्रयास इस समाज ने किया था। लेकिन वामन निंबालकर किसी भी अवस्था-व्यवस्था से हार मानने वाले नहीं थे। उन्होंने दलित साहित्य को मराठी साहित्य के मुख्य प्रवाह के तौर पर स्थापित करने का जो बीड़ा उठाया था, उसे आजीवन निभाया। वामन निंबालकर मानते थे कि साहित्य से ही दलित समाज का समग्र उद्धार संभव है। उन्होंने दलित युवाओं से कलम उठाने और कलम से बंदूक का काम लेने का आह्वान किया था। वामन निंबालकर मानते थे कि समाज के प्रतिष्ठित एवं स्थापित तबके की तरह झाड़ू लगाने वाले, सफाई करने वाले, मेहतर, ढोर, चमार, मांग, महार के भी दुःख-सुख हैं और साहित्य में समाज के इस वर्ग का भी दुःख-सुख भी दिखना चाहिए। हालाँकि वामन निंबालकर यह भी मानते थे कि दलित समाज के सुख-दुःख कविता और कहानी के विषय हो सकते हैं, उपन्यास के नहीं, क्योंकि उपन्यास के लिए जिस व्यापक फलक पर प्रसंग और घटनाओं के रंग भरने होते हैं, दलितों का जीवन तो उस तरह के रंग-बिरंगे प्रसंगों और घटनाओं से वंचित है। लेकिन वामन निंबालकर अपनी पीड़ा के मर्म को जानते थे, सो वैश्वीकरण और बाजारीकरण के युग और प्रभाव में दलितों के मानवाधिकारों को संरक्षित करने के लिए उन्होंने वैश्विक स्तर पर अपनी आवाज बुलंद की थी। दुनिया भर के दलित उनके आह्वान पर संगठित थे और दलितों के मानवाधिकारों को स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी वामन निंबालकर कविता लिखते रहे और उसे जीते रहे और जो जीते रहे, उसी की कविता लिखते रहे। इसमें दो राय नहीं कि वामन निंबालकर के साहित्य, विचार एवं कार्यों की समग्र समीक्षा से उनके विराट व्यक्तित्व से यह समाज परिचित होगा।

वामन निंबालकर की सबसे लोकप्रिय कविता 'माय' का हिन्दी अनुवाद
कविता का मूल मराठी से अनुवाद - पुष्पेन्द्र फाल्गुन

माई

जैस दिन डूबता, अंधेरे का साम्राज्य पसरता
हम देहरी पर बैठते, झोपड़ी में एक ढिबरी तक नहीं
सबके घरों में जलते दीये और चूल्हे
पोई जा रही है भाकरी, पक रही है दलिया और बैगन की सब्जी
नथुनों में भर रही गंध, पेट अंधकार से भरा हुआ
और ऑंखों से भरभराकर बहती है अश्रु-धारा
तभी अंधेरे को चीरती, एक श्यामल छाया प्रकट होती
सिर के भारी बोझे से लड़खड़ाती-लटपटाती
काली-काली दुबली देह में आती है मेरी माई
भोर के पहले पहर से जलाऊ लकड़ों के लिए फिरती सारा जंगल
माँ का इंतजार करते, बैठे रहते हम सारे भाई
लकड़ियाँ जब न बिकती तब भूखे ही सो जाते सभी
एक बार क्या हुआ हमारी समझ कुछ न आया
माई आयी पैर बाँधे जिससे भलभल खून बहता
बड़े से साँप ने डसा है बता रही हैं दो औरतें
फन उठाकर डसा उसने और आराम से चलता बना
माई गिर गई धरती पर झाड़-फूँक  हुई, बैद आए
बीता दिन साथ ले गया प्राण माँ के
हम जो बुक्का फाड़कर रोये, वह हवाओं में तिर गया
छोड़ गई माई हमें हवाओं के थपेड़ों में
ढूँढ़ते हुए अपनी माई, आज भी होता हूँ उदास
दिखती है जलाऊ लकड़ियाँ बेचती दुबली देह तो खरीद लिया करता हूँ उसकी सारी समिधा

वामन निंबालकर का जीवन-वृत्त

जीवन ः 13 मार्च 1943 से 3 दिसंबर 2010

शिक्षा ः इतिहास, हिन्दी एवं आंबेडकर विचारधारा में एम.ए.। पी.एचडी. के लिए हिन्दी और मराठी की विद्रोही कविताओं का तुलनात्मक अध्ययन विषय का चयन। शोध प्रबंध अपूर्ण।

अध्यापन ः 13 साल तक राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के डॉ. आंबेडकर स्नातकोत्तर विभाग में अध्यापन।

प्रकाशित महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियां ः गावकुसाबाहेरील कविता, महायुध्द एवं वाहत्या जखमांचा प्रदेशात (तीनों काव्य संग्रह), दलित साहित्य ः स्वरूप व भूमिका (समीक्षा), अस्मितादर्शची नऊ वर्षे, आंबेडकरी विचारांची दिशा, दलित साहित्य ः एक वाङ्मयीन चळवळ आदि।

संपादित कृतियां ः सामाजिक लोकशाहीचे प्रणेते डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, दलितांचे विद्रोही वाङ्मय, दलित लिटरेचर ः नेचर एंड रोल, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर विचारधारा, आदि।

शीघ्र प्रकाश्य ः मराठी की सर्वोत्कृष्ट दलित कथाएं, कथा संग्रह 'आग', बाबासाहब के 450 पत्रों का संग्रह।

पुरस्कार एवं सम्मान ः महायुध्द को 1988 में तथा वाहत्या जखमांचा प्रदेशात को 2010 का प्रतिष्ठित महाराष्ट्र राज्य उत्कृष्ट साहित्य पुरस्कार। 1989 में आयोजित नौवें अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष। भारतीय दलित साहित्य अकादमी का डॉ. आंबेडकर पुरस्कार। डॉ. आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय औरंगाबाद, अमरावती विश्वविद्यालय, उस्मानिया विश्वविद्यालय हैदराबाद, पुणे विश्वविद्यालय, शिवाजी विश्वविद्यालय कोल्हापुर एवं रा.सं.तु.म. नागपुर विश्वविद्यालय के एम.ए. पाठयक्रम में कविताओं एवं काव्यसंग्रहों का समावेश। कई कविताओं का जर्मन, रूसी एवं अंग्रेजी भाषाओं में अनुवाद। लाखनी, भंडारा में 2003 में आयोजित विदर्भ साहित्य संघ के 54वें साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष। साथ ही देश विदेश में आयोजित विविध मराठी साहित्य सम्मेलन एवं साहित्य परिषदों में सहभाग। इजराइल, मिस्र, लंदन, ईरान एवं दक्षिण अफ्रीका की यात्राएं।

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

फाल्गुन विश्व का नवम्बर अंक प्रकाशित

मासिक वैचारिक पत्रिका फाल्गुन विश्व का नवम्बर अंक प्रकाशित हो चूका है. इस बार का अंक मासूमियत को समर्पित है. आवरण पर मशहूर छाया चित्रकार संगीता महाजन द्वारा खींचा गया चित्र है.

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

सशस्त्र प्रतिरोध

मूल लेखक - गौतम नवलखा

केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने 6 मई 2010 को एक प्रेस विज्ञप्ति के जरिए घोषित किया कि माओवादियों का 'समर्थन' करते पाए गए व्यक्ति पर भयानक यूएपीए यानी गैरकानूनी गतितिध निरोधक कानून की धारा 39 की तहत मुकदमा चलाया जाएगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 24 मई की अपनी प्रेसवार्ता में स्पष्ट किया कि 'लोकतंत्र में हर किसी को अपनी राय की अभिव्यक्ति का अधिकार है और अभिव्यक्ति के इस अधिकार में तब तक कोई रुकावट पैदा नहीं होगी, जब तक कि कोई हिंसा की पैरोकारी में संलिप्त न हों।' इसके बावजूद कि प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अनुमोदन करती है, आखिर उनके इस कथन कि 'जब तक कि कोई हिंसा की पैरोकारी में संलिप्त न हों', का क्या आशय है? क्या हिंसा के इस्तेमाल के समर्थक राज्य भी उनकी इस चेतावनी के दायरे में हैं? क्या वर्तमान व्यवस्था की चीजें, जिनमें वर्तमान राज्य की असमानता और विषमता की परिभाषा भी शामिल है, से अहिंसा को बल मिलता है? क्या दमन का मुकाबला करने के अधिकार अथवा आत्म-रक्षा के अधिकार का मतलब हिंसा की पैरोकारी है? यदि मैं इस सत्ता को 'संभवतः शांति से और जरूरी हुआ तो हिंसा से' उखाड़ फेंकने की वकालत करूँ तो क्या मैं हिंसा का पैरोकार हुआ? संरचनात्मक हिंसा पर चर्चा खूब होती है, लेकिन इसे समाप्त करने के लिए आखिर उसी उग्रता और तत्परता का इस्तेमाल क्यों नहीं होता जो राजनीतिक हिंसा से सामना करते वक्त दिखाई जाती है?
सशस्त्र प्रतिरोध के खिलाफ, जरूरत और साधन के मुद्दे, लोगों की हिंसा के प्रति प्राकृतिक अरुचि और सशस्त्र समूह दल द्वारा हथियारों के बल पर मर्जी थोपने जैसे तर्क दिए जाते हैं; लेकिन तब भी यह नकारा नहीं जा सकता कि हिंसात्मक प्रतिरोध ही उद्धारक और सामर्थ्यदायी भूमिका निभाते रहे हैं और निभाते रहेंगे। इंडोचीन और अन्य जगहों पर साम्राज्यवाद के खिलाफ हुए संघर्षों का उल्लेख आखिर और किस तरह से संभव है? 1905 में रूस के खिलाफ जापान को मिली जीत ने क्या एशियाई लोगों को यूरोपीय प्रजातिवाद को चुनौती देने के लिए प्रेरित नहीं किया? अंग्रेजी साम्राज्य के लिए सूडान, ईरान, चीन, क्रीमिया में युद्धरत भारतीय सैनिकों के अनुभव ने क्या उन्हें यह एहसास नहीं कराया कि वे सहयोगी यूरोपीय सैनिकों से बीस न सही, उन्नीस भी नहीं हैं। क्या 1917 की रूसी क्रांति ने कइयों को उग्र सुधारवाद के लिए राजी और प्रेरित नहीं किया? द्वितीय विश्वयुद्ध  के दौरान स्तालिन के नेतृत्व में रूसियों द्वारा प्रदर्शित वीरता और साहस को क्या हम नकार सकते हैं, खासकर जर्मनी की सर्वोत्कृष्ट सेना की स्तालिनग्राड में पराजय को, कि जहाँ से जर्मनी का नाज़ी सेना के पराजय की शुरुआत हुई। क्यों कोई इस हकीकत को खारिज करे?
कुछ लोग तर्क देते हैं कि वे युद्ध के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक लक्ष्यों को पाने के लिए राजनीतिक हिंसा के विरोधी हैं। मतलब कि विरोध हिंसा का नहीं, सिर्फ संगठित हिंसा का है, क्योंकि संगठित हिंसा असल में गैर-लोकततांत्रिक है। वास्तव में जनता के ऐच्छिक विद्रोह से ज्यादा घातक कुछ नहीं है, क्योंकि इसका नतीजा खून की होली होती है। युद्ध के बाद फ्रांस में 45 हजार 'नाज़ी सहयोगियों' को जलाकर मार दिया गया। आखिर किस तरह से इस जनसंहार को श्रेष्ठ ठहराया जा सकता है?

तो क्या साधन महत्वपूर्ण नहीं? क्या हम इच्छित लक्ष्यों तक उस संसाधन से पहुँच सकते हैं कि जिसके साधन हिंसक हैं?

अब, अहिंसा के प्रबल प्रस्तावक भी स्वीकार करते हैं कि कुछ स्थितियों परिस्थितियों में हिंसा न्यायसंगत एवं जरूरी है, जैसे, दंगा करती भीड़ से यदि किसी गरीब को जलने से बचाना है, औरतों को बलात्कारियों से बचाना है, बच्चों को मारे जाने से बचाना है। हालाँकि, यह भी माना जा चुका है कि राज्य शासन अपने बल हिंसा के लगातार उपयोग से जनआंदोलनों को कुचलती रही है और हिंसा के साधन के मनमाफिक इस्तेमाल से यह सुनिश्चित करती रही है कि उत्पीड़ित कभी प्रवरता न हासिल करने पाएं। इसलिए यह मानने में कदापि संकोच नहीं होना चाहिए कि उत्पीड़न और शोषण से मुक्ति के लिए बल का इस्तेमाल न्यायसंगत है, साथ ही हमें यह भी मानना चाहिए कि प्रत्येक प्रतिरोधी कार्य जरूरी नहीं कि जन आंदोलनों को प्रेरित ही करेगा।
यह दिलचस्प है कि बहुत से लोग प्रगट में, सरकारी लड़ाकों की मौत पर विलाप करते हुए और अपने नौकरीपेशा वर्ग की दुहाई देते हुए माओवादियों पर यह आरोप मढ़ते हैं कि वे इन्हें बेवजह निशाना बनाते हैं; लेकिन वास्तव में, ये उन सुरक्षा बल के जवानों लड़ाकों या कहें कि समूचे सुरक्षा तंत्र को किसी भी प्रकार के अपराध-बोध से छुटकारा दिलाने का यत्न कर रहे होते हैं। सुरक्षा बल चाहे तो बलात्कार करे, लूटमार करे, तहस-नहस करे, प्रताड़ित करे, और हम बस इतने से ही संतुष्ट हो जाएं कि उनका वर्ग उन्हें अपराध-बोध से निजात दिला रहा है? मान्य है, कि प्रत्येक सैन्य जवान बलात्कारी या क्रूर नहीं होते। बत्रडी संख्या में सैन्य जवान बस्तर जैसे युध्द क्षेत्र से बाहर जाना चाहते हैं। कई तो यहाँ तक दावा करते हैं कि इस तरह की लड़ाइयाँ लड़ने के लिए सेना में भर्ती नहीं हुए हैं। लेकिन तब, 2008 की गर्मी में कश्मीर के 'रगड़ा' आंदोलन को भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा कुचले जाने पर हमारे पास क्या स्पष्टीकरण है? वहीं जम्मू के हिन्दू बहुल जिलों में कट्टरपंथियों द्वारा नीत आंदोलन के साथ बचकाना व्यवहार? माओवादियों द्वारा सुरक्षा बलों को मार देने के नाम पर ऑंसू बहाने वाले आखिर उस समय कहाँ थे?
हो सकता है कि हमें राज्य शासन द्वारा प्रयुक्त हिंसा को न्यायसंगत मानना सिखाया गया है, हालाँकि 'सत्ता हस्तांतरण' के 63 वर्षों के बाद भी, ऐसा एक भी साल नहीं बीता है, जब सर्वाधिक युक्तिसंगत माँग कर रही अपनी ही जनता का दमन भारतीय सेना के जरिए न कराया गया हो। अपनी ही जनता के दमन के अधम कृत्य के दौरान सेना ने अगिनत अपराध किए हैं, लेकिन अपनी ही जनता के खिलाफ चलाए जा रहे इस गैर कानूनी युद्ध की खिलाफत में कोई अभियान अंजाम नहीं पा सका। तब भी नहीं, जब 7 जुलाई 2009 को प्रधानमंत्री ने लोकसभा में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध को एकमात्र विकल्प के तौर पर खारिज किया। पाकिस्तान कि जिसे मीडिया और व्यवस्था सबसे घटिया तरीके से संबोधित करने से नहीं चूकते। उस समय कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री से पूछा था कि आप अपने ही लोगों पर युद्ध क्यों नहीं समाप्त करते? जब बातचीत और संवाद ही एकमात्र विकल्प हैं, तब यही रास्ता अपने लोगों के लिए क्यों अख्तियार नहीं करते? यदि भारत में शांति-चयन की उम्मीद बरकरार है और पाकिस्तान से मिलकर इसमें इजाफा ही होना है, तो फिर सरकार यही रुख अपने लोगों के प्रति क्यों नहीं रखती? दरहकीकत यदि भारत सरकार अपने लोगों के खिलाफ चलाए जा रहे युध्द को समाप्त करती है तो जनता को आश्वस्त करने का यह सबसे सुनिश्चित तरीका होगा कि सरकार को अपनी सुनाने के लिए अथवा अपने प्रति गंभीर करने के लिए हिंसा को संसाधन बनाने की जरूरत नहीं। और इस तरह सशस्त्र प्रतिरोध की अपील को बहुत हद तक खत्म किया जा सकेगा।
मुद्दा यह है कि 'विवेकपूर्ण नीतिशास्त्र हमें इस बात की इजाजत देता है कि किसी भी कार्य को उसके अच्छे अथवा बुरे परिणामों से ऑंकना चाहिए, न कि परिणाम विहीन नियमों के अनुपालन मात्र से।' (पुस्तक - मार्क्सिज्म, सोशियलिज्म, इंडियन पॉलिटिक्स ः ए व्यू फ्राम दि लेफ्ट, लेखक- रणधीर सिंह, आकार बुक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2008, पृष्ठ 236)। यह भी तर्क है कि 'नैतिक सिद्धांतों से विलग सिद्धांत कभी भी सही नहीं हो सकते, चाहे कितने ही अच्छे उद्देश्य पाने हों, फिर चाहे कितने ही लोग प्रभावित होते हों यदि नियम न तोड़े जाएं तो, नीतिशास्त्रीय दृष्टिकोण के उत्कृष्ट प्रतिबिम्बक की बजाय, वे परम अनैतिक हैं और आम तौर पर यही माने भी जाते हैं। (पृष्ठ 327)। और इसीलिए 'साधन और उद्देश्य के मामले में गलत या सही साधन का इस्तेमाल मुद्दा नहीं है, क्योंकि हमने गलत साधन के इस्तेमाल से अच्छे परिणाम पाए या कि जिससे गलत व ज्यादा गलत साधन के इस्तेमाल को टाला जा सका, बल्कि मुद्दा यह है कि हमने जो अच्छे परिणाम हासिल किए क्या वे सचमुच सार्थक हैं, या कि उस अच्छे परिणाम को हासिल करने के लिए हमारे पास कोई अन्य कम गलत साधन हैं।'' (पृष्ठ 328)।
आइए इस बहस को आगे बढ़ाते हैं। हिंसा तब उद्धारक की भूमिका में होती है, जब उत्पीड़ित जन आत्मरक्षा में रत होते हैं, जब वे आम जन को सुविधाभोगी बेकाबू सैन्य शक्ति से बचाते हैं कि जो निरपवाद रूप से समृध्द, शक्तिशाली और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की साथी है। बंदूक उठाना, बंदूक चलाना सीखना और उसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर अच्छाइयों के लिए करना, आखिर हम इस हिंसा को 'बुराई' क्यों मानें? बल्कि हमें तो हिंसा को मूल्यांकन से तटस्थ रखना चाहिए। यह प्रासंगिक होगा कि हम यह देखें कि हिंसा का इस्तेमाल किस मकसद के लिए और किस तरह हो रहा है। इसलिए जरूरी है कि किसी भी नतीजे पर पहुँचने से पहले उसे करीब से देखा जाए। यह मान लेना कि सांप्रदायिक ताकतें हिंसा का इस्तेमाल करती हैं और इसीलिए हिंसा के उनके द्वारा इस्तेमाल के तरीके और दूसरों के इस्तेमाल के तरीके एक ही बात है, दरअसल अपरिष्कृत मान्यता है। असल में, बड़ा अंतर यह है कि सांप्रदायिक ताकतों के लिए एक समुदाय दुश्मन होता है और नागरिकों की जान लेने को वे पूर्ण युक्तिसंगत करार देते हैं। यहाँ मैं यह जोड़ना चाहता हूँ कि उन्हें सत्ता का समर्थन और संरक्षण प्राप्त होता है। इस तथ्य के मद्देनजर कि भारतीय राज्य धारा 121 अथवा टाडा, पोटा अथवा यूएपीए का इस्तेमाल कर सकती है, कहा जा सकता है कि भारतीय राज्य ने हिंदू सांप्रदायिक ताकतों को मेहरों की तरह पाला-पोषा है। केन्द्रीय गृहमंत्री अपने एक बयान में कहते भी हैं कि गृह मंत्रालय को हिंदू कट्टरपंथियों पर नजर रखने की कोई जरूरत नहीं है। (1 जून 2010 का इकोनॉमिक टाइम्स)। लेकिन वह यह समझाने में विफल रहे कि आखिर गृह मंत्रालय ने अल्पसंख्यकों, माओवादियों, नक्सलवादियों, कश्मीरियों, आसामियों, मेतियों, नागाओं पर नजर रखने के लिए एक अलग विभाग क्यों बना रखा है, जो दशकों से इन पर नजर रखे हुए है?
बहरहाल, महत्वपूर्ण यह है कि जब तक राज्य शासन हिंसा के साधन का मनमाफिक इस्तेमाल करती रहेगी, आमजन तिरस्कृत और दासत्वयुक्त जीवन जीने को बाध्य रहेंगे। आजादी और स्वाधीनता मध्यम वर्ग के विशेषाधिकार रहेंगे और वे ही इनका उपभोग करेंगे। क्या हम जानते हैं कि यदि कोई दलित या आदिवासी मार्क्सवादी अथवा आंबेडकर साहित्य के साथ देखा जाता है, तो उसे संभावित नक्सलवादी माना जाता है, ठीक उसी तरह जैसे मुस्लिम नौजवान को संभावित 'जेहादी' की तरह देखा जाता है। कामकाजी लोग असुरक्षित हैं, जैसे ही वे लोगों को लामबंद करने में सफल होते है और व्यवस्था की असमानताओं और अपर्याप्तताओं पर सवाल उठाने लगते हैं, वे राज्य शासन के दमनकारी तरीकों के निशाने पर आ जाते हैं। इसलिए, जब तक राज्य शासन आमजन के खिलाफ युद्ध को समाप्त नहीं कर देता, बंदूकों के जरिए आत्मरक्षा के इस अधिकार का आत्मसर्मपण मानो अनर्थ को निमंत्रित करने जैसा होगा। बल्कि जब तक आम आदमी हथियारबंद नहीं होगा, सत्ताधारी वर्गों द्वारा हिंसा के साधन कि जिन्हें मुख्य तौर पर आमजन के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है, का अपने हित में उपभोग करता रहेगा और उन्हें निष्प्रभावी नहीं किया जा सकेगा।
अहिंसा के तमाम शब्दाडम्बरों के बावजूद भारत राज्य भारी हथियारों से लैस है। एक ओर जहाँ शस्त्रागार विध्वंसक शक्तियों से अटे पड़े हैं, वहीं वृहदाकार सैन्य बल हैं, जिनकी शक्ति को क्रूर कानून कई गुणा और बढ़ा देते हैं और सत्ताधारी वर्ग को 'चिरकारी जातिसंहार' के लिए प्रेरित करते रहते हैं। इस समय सैन्य बलों के जवानों की संख्या (सेना और केन्द्रीय अर्ध सैनिक बलों को मिलाकर) ढाई करोड़ है। इसमें दो करोड़ पुलिस (जिनमें कम से कम 30 फीसदी पारंपरिक हथियारों से लैस हैं) जवानों को मिला दीजिए और ध्यान दीजिए कि इस महाकाय सैन्य शक्ति में से कम से कम 50-60 फीसदी जवान भारत के विभिन्न हिस्सों में अपने ही लोगों से लत्रड रहे हैं। अतः आसानी से समझा जा सकता है कि भारत राज्य कितना हिंसक है। सैन्यबल विशेषाधिकार कानून यानी एएफएसपीए और गैरकानूनी गतिविधि निरोधक कानून के दम पर राजनीतिक आंदोलनों और विचारधारा (हिंदू चरमपंथी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल नहीं) पर प्रतिबंध लगाया जाता है, और आपके पास लोकप्रिय आंदोलनों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए विकट सैन्य बल और कानून हैं ही।
जबकि छह साल की उम्र से कम 45 फीसदी बच्चे कुपोषण, कुपोषाहार एवं रुद्धविकास से पीड़ित हैं, या फिर कैलरी ग्रहण के खेल के जरिए समझें तो 2400 से 1800 और अब 1500 तक फिसल चुका है यह आंकड़ा, मतलब कि आप आंकड़ों के जरिए यह बता सकते हैं कि भारत में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की संख्या घट रही है, लिहाजा करोड़ों भारतीयों के लिए खादान्न सुनिश्चितता की जरूरत भी घट रही है। साफ जाहिर है कि अपने ही लोगों को धीमी मौत मरने के लिए छोड़ दिया गया है। इस पर यह तुर्रा कि यह हिंसा तो लोगों द्वारा चलाई जा रही राजनीतिक हिंसा के सामने कुछ भी नहीं, असल में हमारी नासमझी ही जाहिर करता है। आमजन से यह कहने में अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव होता है कि कृपया धीरज रखे कि 'विकास' का फल आपकी गोद में आकर जरूर गिरेगा। सहनशक्ति और धार्मिक आस्था का यह मार्मिक नमूना हो सकता है, लेकिन सच तो यह है कि लोग 63 साल से पाने के इंतजार में यही करते-करते निराश हो चुके हैं। विडंबना यह कि वैश्विक मानव विकास सूचकांक में भरतीय 134वें क्रम पर फिसल गए हैं, वहीं सैन्य खर्चों में बढ़ोत्तरी करते हुए हम नौवें पायदान तक चढ़ चुके हैं और हम दुनिया की बारहवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी हो गए हैं, जहाँ 1,26,700 भारतीयों की जमा पूँजी देश की सकल आय के तिहाई हिस्से के बराबर है, वहीं 64 करोड़ 50 लाख भारतीय गरीबी और अभाव की टीस झेल रहे हैं।
जो लोग सश्स्त्र संघर्ष की निंदा करते हैं उनका दावा है कि लोकप्रिय आंदोलनों के जरिए वर्तमान संस्थापनों को लोगों की जरूरत पूरी करने लायक बनाया जा सकता है। मुद्दा तो यही है कि इस तरह के प्रयास तो तब भी किए गए जब भारतीय सत्ताधारी वर्ग के लिए माओवादी सबसे बत्रडे खतरे के रूप में नहीं उभरे थे और न ही माओवादी विद्रोह के चलते इस तरह के प्रयास बंद हुए, बल्कि यह जरूर हुआ कि माओवादी आंदोलन के मजबूत होने से उन्हें और संबल मिला। यह इसलिए भी उल्लेखनीय है कि 2004-05 में जब माओवादी आंध्रप्रदेश में आघात का सामना कर रहे थे और सलवा जुडूम जैसे दमन के चलते छत्तीसगढ़ के सिर्फ एक जिले तक सिमट गए थे, किसी को यकीन नहीं था कि वे इतनी मजबूती से फिर उभर पाएंगे। लेकिन वे उभरे। इतने कि वर्तमान समय के तमाम समाज कल्याण विधेयक, फिर चाहे वह नरेगा (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी कानून) हो, वन कानून हो, पेसा हो, ग्राम सभाओं द्वारा संयुक्त वन प्रबंधन समिति का प्रस्ताव हो, सभी इस जरूरत से प्रेरित अथवा समर्थित हैं कि गरीब से गरीब को माओवादियों नक्सलियों के मोहपाश से छुडाओ। सोचिए कि यदि प्रधानमंत्री ने आदिवासियों के खिलाफ क्षुद्र अपराधों के लिए 1980 से लंबित लाखों मुकदमों को खत्म करने की ओर ध्यान दिया होता तो माओवादियों नक्सलवादियों को इतनी बड़ी संख्या में आदिवासियों का साथ नहीं मिला होता। केन्द्रीय विधि मंत्री खुद राय दे रहे हैं, 'आम नागरिक, विशेषकर गरीब, महिलाएं, बुजुर्ग और कमजोर तबके के लोगों में यह भावना बलवती है कि कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया उनकी पहुँच से बाहर हो गई है।' वह जोड़ते हैं कि आम नागरिक का यह मोहभंग उसे 'नए तरह की हिंसा के लिए, नागरी असंतोष को संघर्ष में बदलने के लिए, सशस्त्र किसान एवं आदिवासी आंदोलन, नक्सली और माओवादी विद्रोह' के लिए तैयार कर रहा है। (हिंदुस्तान टाइम्स २५/०२/ २००९)।
केन्द्रीय गृहमंत्री के 7 जुलाई 2009 को लोकसभा में दिए गए बयान को देखिए, 'नक्सलवाद अब विभिन्न राज्यों के विविध असमन्वित अथवा असम्मिलित समूहों द्वारा संचालित कार्रवाई मात्र नहीं रह गई है। आज नक्सलवाद का संचालन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) कर रही है, जो अब एक बेहद सुगठित संगठन है। उनके पास केन्द्रीय मिलिट्री कमांड भी है।' दूसरे शब्दों में वे अब एक मजबूत सैन्य शक्ति हैं, जो एक साथ कई हमले करने में सक्षम हैं, कि जिसमें अलग-अलग समूहों में 200 से 500 सशस्त्र कैडर हैं, वे निगरानी खुफिया तंत्र मुखबिरों के संजाल से बचते हुए लंबी दूरी की यात्राएं करते हैं। साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि आमजनों के स्वैच्छिक और निर्भय होकर माओवादियों से तादात्म्य स्थापित किए बिना, उनके इतने व्यापक सामाजिक समर्थन के आधार का बरकरार रहना, मुमकिन नहीं है।
इस तरह की शक्ति का दमन असंभव है। लेकिन लगता नहीं कि संप्रग सरकार के यकीन के मुताबिक यह युद्ध 2012 तक समाप्त हो पाएगा। अब तो केन्द्रीय गृह मंत्री भी शर्त लगाने लगे हैं कि यह युद्ध 'लंबा खिंचने' वाला है।
विवाद्य तौर पर, एक दल का सत्ता में बने रहने का समय तेजी से घट रहा है। क्योंकि चीन अथवा सोवियत संघ में यह घटित हुआ, इसका यह मतलब नहीं कि यह भारत में भी इसी 21वीं सदी में घटित होगा। सच तो यह है कि हमारे निकट पत्रडोस नेपाल में भी यह संभव नहीं हुआ, जहाँ दीर्घकालिक जनसंग्राम ने नेपाल की संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के लिए मुख्य राजनीतिक शक्ति बनने का मार्ग प्रशस्त किया। जबकि नेपाल की संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) को छोत्रड अन्य सभी राजनीतिक दलों ने नेपाली सेना और पुलिस को अपनी शक्ति की तरह, अपनी रक्षा के लिए इस्तेमाल किया। भारत में जो राजनीतिक दल विद्यमान यथापूर्व स्थिति को स्वीकार करते हैं, वे जानते हैं कि जब वे सत्ता में आएंगे तो विशाल दमनकारी बल उनके नियंत्रण में होगा। विपक्षी दलों के रूप में भी वे निस्सहाय नहीं हैं। और बदतर हालातों में राजनीतिक दलों द्वारा निर्देशित शक्तियाँ कई बार वामपंथी विद्रोहियों से ज्यादा ताकतवर होती हैं। नेपाल के माओवादियों की उपलब्धियाँ एक तरफ, क्या उनका अस्तित्व भी शेष रहता यदि वे शस्त्रविहीन होते?
भारत के हालात के मद्देनजर, जहाँ एक दलीय नेतृत्व पर विचार ही मुश्किल है, जबकि वैविध्यता और राजनीतिक अनेकत्व के साथ हम छह दशक बिता चुके हैं, यह मानना कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) एक दलीय शासन लादेगी, लगभग असंभव है। हालाँकि, सशस्त्र कैडरों और युध्द निश्चित क्षेत्रों में हथियारों के आश्रय के बिना भारतीय राज्य और समाज का सामाजिक रूपांतरण न तो व्यवहारिक है और न ही संभव। क्योंकि उनके आलोचकों को जवाब देना है कि आखिर वे किस तरह से सत्ता पाना या हासिल करना चाहते हैं।
अब हम सभी लोग स्वीकार कर रहे हैं कि किसी भी राजनीतिक विचारधारा के दमन अथवा अपराधीकरण की नीति नादानी ही कहलाएगी। सिर्फ इसलिए कि राज्य ने कुछ विचारों को वीभत्स और इन विचारों के प्रचार को गैर-कानूनी घोषित कर दिया है, इसीलिए हमें किसी आज्ञाकारी की तरह इसे स्वीकार कर लेना चाहिए? आखिरकार हम सभी गवाह है कि सत्ताधारी इस तरह की निर्णायक शक्तियों का किस तरह से सुव्यवस्थित दुरुपयोग करते रहे हैं, इसलिए प्रतिबंध लगाने की तैयारी 'राष्ट्रीय सुरक्षा' के लिए निर्देशित वैधानिक विधानों के समक्ष आह्वान है, फिर संसदीय अनदेखी और न्यायिक क्षतिपूर्ति तो वैसे ही सीमित हो जाती है। समस्या तब और विकट हो जाती है जब इस तरह की कार्रवाई के दौरान औपचारिक 'कानूनी नियमों' को भी ताक पर रख दिया जाता है और युद्ध की बाध्यताएं लागू कर दी जाती हैं, जिसमें मारना या मारा जाना महज राज्य सिद्धांत मात्र हैं।
तो क्या इसका मतलब है कि माओवादी निर्दोष हैं? इससे परे हैं। बहरहाल, अपने आलोचकों को गंभीर बनाने के लिए माओवादियों को चाहिए कि उग्र सुधारवादी राजनीति के विस्तार के व्याप्त वर्तमान अवसर को झपट लें। जब तक कि राज्य सैन्यवादी तरीकों पर चलता रहेगा, हिंसा अपनी भूमिका निभाता रहेगा, लेकिन हिंसा की अपनी सीमाएं हैं। इन सीमाओं का निर्धारण राजनीति करती है। प्रतिरोध करना एक बात है, लेकिन वैकल्पिक राजनीति को प्रोत्साहित करना बिल्कुल अलग बात है। जबकि विस्थापन, खनन और खनिज आधारित पिंडाश्मों के लिए भूमि हथियाना, वन कानून, कल्याणकारी जरूरतों ने ध्यान आकृष्ट किया है, वहीं, वर्तमान क्रम की चीजों के लिए विकल्प किसी न किसी तरह गुम है। ऐसा क्यों है कि दसियों हजार किसानों की आत्महत्या से ज्यादा माओवादियों के आपराधिक कृत्य पर घोर प्रतिक्रिया होती है? अब इस समझदारी को क्या कहिए कि जो मानती है कि विकास की प्रक्रिया में कृषि की संभावित भूमिका नगण्य है, विशेषकर, रोजगार पैदा करने की दृष्टि से और आर्थिक विकास के चालक के रूप में। क्रांतिकारी वाम, खासकर माओवादियों के पास कृषि के घटते रुझान को बदलने के क्या उपाय हैं, जो कि ग्रामीण कार्य शक्ति के 60 फीसदी की आजीविका संबंधी जरूरतों को पूरा कर रही है? घिसी-पिटी आलोचना को जारी रखने की बजाय हमें विकल्प की जरूरतों पर क्या ध्यान देने की आवश्यकता नहीं? क्या भूमि सुधार वितरण से उत्पादन पुष्ट होगा और रोजगार के अवसर बनेंगे? दूसरी ओर यदि विनिर्मिति को न्यायसंगत विकास की मुख्य कत्रडी माना जाए तो यह विकास का बेलगाम तरीका होगा कि सुनियोजित? निवेश कहाँ होने चाहिए? खनन नीति क्या होनी चाहिए? उदाहरण के लिए क्या हमें बॉक्साइट का खनन रोक देना चाहिए? क्यों इसे मुद्दा बनाना चाहिए? क्या हमें गरीबी खत्म करना चाहिए ताकि राज्य अपनी सदभावपूर्ण भूमिका बखूबी निभा सके? या कि गरीबी उन्मूलन और जनसशक्तिकरण के लिए हमारे पास कोई वैकल्पिक दृष्टि है? ऐसा क्यों है कि उत्तर पूर्व और जम्मू-कश्मीर में दशकों लंबे सैन्य दमन ने हमें इस बात पर सोचने को प्रोत्साहित नहीं किया कि आखिर हमारा यह कैसा राज्य है जो साल दर साल उन आंदोलनों को नेस्तनाबूद कर रहा है, जो आत्म-निर्धारण के अधिकार की माँग, अत्यंत लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से करते हैं? क्या भारत मुस्लिम विरोधी, हिंदू समर्थक, जातिवादी अथवा दमनकारी राज्य है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस तरह के दमन और दानवीकरण में लिप्त है? मुद्दा यह है कि यदि वामदलों को विश्वसनीय बनना है तो उन्हें गलत के सतही घोषणाओं से उबरकर समस्या के मूल कारणों और उन प्रक्रियाओं को संबोधित करना होगा, जो असमान, विषम और रुध्दविकास को जन्म दे रही हैं। यह अफसोसनाक है कि संसदीय व्यवस्था और खुली राजनीति में 58 वर्ष और क्षेत्रीय स्तरों पर सत्ता पर काबिज होने के बावजूद वामदल किसी तरह की वैकल्पिक दृष्टि पेश नहीं कर पाए। उनके हिस्से में कुछ उपलब्धियाँ जरूर हैं, लेकिन वह उस तरह की नहीं कि जिससे उत्साहित होकर कोई कहे कि उन्होंने राजनीति के लिए अलग दृष्टि पेश की। हालाँकि उनकी असफलताएं खुली राजनीति को खारिज नहीं करती है, लेकिन हमें यह जरूर याद दिलाती है कि हम कहाँ चूक गए, कहाँ नाकामयाब हुए।
दुर्भाग्य से, माओवादी अपने कमजोर और इक्का-दुक्का शहरी उपस्थिति की वजह से विकल्प पेश कर पाने में असमर्थ हैं। इसलिए विषम लेकिन बड़ी जिम्मेदारी उन लोगों के काँधे पर है कि जो खुद को क्रांतिकारी समझते हैं, वे विकल्पों के साथ सामने आएं। अथवा हम उस अवसर से हाथ धो बैठेंगे, जिसे माओवादियों ने निगमित खनन और खनिज आधारित पिंडाश्मों के खिलाफ युध्द चलाकर अपने विकट और वीरोचित प्रतिरोध से हमारे लिए अर्जित और सर्जित की है।
मूल अंग्रेजी से अनुवाद - पुष्पेन्द्र फाल्गुन (लोकमत समाचार, नागपुर के दीपावली विशेषांक के लिए. )




गुरुवार, 4 नवंबर 2010

भीड़ का चेहरा

अपनी एक पुरानी कविता याद आ रही है, 'भीड़ का चेहरा'

मैं पढ़ता हूँ आप सुनिए;

'खुद को भीड़ का चेहरा होने से बचाए रखना
मुश्किल है, भैया मुश्किल

जो हमेशा अपनी पहचान को
नाक पर लिए फिरते हैं
पार्टी-शार्टी में, सभा-समारोहों, जलसों में
भीड़ में शामिल होते ही चिल्ला पड़ते हैं, ''भैया रावन, बचाओ"
भीड़ में शामिल होते ही
उनकी आँखों की पुतलियाँ करिया जाती है
डूबने के भय से नहीं
दूसरों के उबरने कि चिंता में

भीड़
जो देती है आश्वासन
कि रहेगी हमकदम हमारी
हँसेगी, रोएगी, हमारी इच्छा के अनुरूप ही
शामिल होते ही हमारे
हमें 'स्टेचू' कर अलविदा हो जाती है

और 'स्टेचू' में 'मोशन' करते हम
मुस्कुराते हैं, हँसते हैं
भीड़ की मानिंद, भीड़ ही बनकर

कहते हैं भीड़ में अपना चेहरा ढूँढ़ना असंभव नहीं
कहते यह भी हैं
कि भीड़ में अपना चेहरा लेकर घुसना भी संभव नहीं'